welcome
मेरी खोई गाय रंभाई |

कहां कहां ढूंढा जब से , आखोँ से हुई माँ ओझल |
जंगल – पर्वत रेत – खेत , छाना सारा भूमंडल |
दिशाहीन हो तेरी याद में , रोंद रहा हूँ जल – थल |
अंधकार छाया जग में, देता कुछ नहीं दिखाई |
मेरी खोई गाय रंभाई ||

कितनी भोली, कितनी मोहक, रोम रोम में प्यार लिए |
अनुपम दिव्य ज्योति हो तुम, सारी धरती का भार लिए |
करते हैं प्रहार वही, जिनपर इतने उपकार किए |
मानव दानव बना आज का सबसे बड़ा कसाई |
मेरी खोई गाय रंभाई ||

मेरे पुकारते ही तुम, भागी भागी आती थी |
चाट हथेली और चेहरा, मुझको गले लगाती थी |
कभी कभी तो हो विभोर, कदमों में मुझे सुलाती थीं |
देख मेरे आंसू इक दिन – नैनों में नीर भर लाई |
मेरी खोई गाय रंभाई ||

अच्छा लगता है जब तुम - मेरे सपनोँ में आती हो |
सारी सारी रात मुझे, किस्से और कथा सुनाती हो |
सेवा में कमियों से भी, अवगत मुझे कराती हो |
हुआ धन्य फिर से जीवन, जब कामधेनु घर आई |
मेरी खोई गाय रंभाई ||

पुष्प
हे पुष्प तुम जब खिलते हो, अनजानी हवाओं से मिलते हो |
खुशबू के खजाने लुटते हैं, मस्ती में जब हिलते हो ||
इतने रंग समेटे हो कि, कोई नहीं गिन पाया है |
तितली और भंवरों ने मिलके, राग तुम्हारा गाया है ||
कहां नहीं होते तुम पुष्प, वीराने और गुलशन तक |
ईश्वर के चरणों में तुम, पहुंचे मस्तक के चन्दन तक ||
कभी शादी पर तो समाधि पर, माला में प्यारे लगते हो |
कभी स्वागत में, कभी राहत में, मांग किसी की भरते हो ||
कभी जल में बहाये जाते हो, हर जगह सजाये जाते हो |
जंगल, पर्वत और दलदल में, खुशबू फैलाए जाते हो ||
देखो हम सब का जीवन, कितना मिलता जुलता है |
बचपन, यौवन और बुढाया , ब्रह्म द्वार फिर खुलता है ||
सभी को जाना पड़ता है, आखिर मुरझाना पड़ता है |
जाती हैं बिखर जब पंखड़िया, फिर भी मुस्काना पड़ता है ||
गौ – महिमा

धरती और गंगा की भांति, ये गऊ हमारी माता है |
सिर्फ़ आज का नहीं हमारा, जन्म जन्म का नाता है ||
अवतारों, ऋषियों, मुनियों ने, युग - युग में तेरा दान किया,
पंचगव्य से तूने माँ, हम सब का कल्याण किया,
जिसने भी की सेवा तेरी, सबको ही वर्दान दिया,
हुआ मुक्त पापों से प्राणी, ईश्वर ने सम्मान किया,
तेरी भोली आँखों में माँ, नन्दलाल नज़र आता है |
सिर्फ़ आज का नहीं हमारा, जन्म – जन्म का नाता है ||१||

हमने नहीं पाला तुमको, तुमने हमको पाला है,
तू ही सबसे अच्छा धन, तेरा धर्म निराला है,
कुछ नहीं लेती, सब कुछ देती, पुन्य भूमि गौशाला है,
काले कलियुग में भी दिखता, तेरा अमर उजाला है,
तेरा प्यारा, सुन्दर चेहरा, हमको बहुत सुहाता है|
सिर्फ़ आज का नहीं हमारा, जन्म जन्म का नाता है ||२||

बदल गया इन्सान आज कल, भुला दिए हैं सब उपकार,
कल का रक्षक, आज है भक्षक, माँ तेरे दु:ख हैं हजार,
बाल – गोपाल सभी चिंतित हैं, देख तुम्हारा तिरिस्कार,
कहा गई करुणा और पूजा, गौ सेवा भूला संसार,
भला कोई बच्चा माँ को, ऐसे कभी भुलाता है |
सिर्फ़ आज का नहीं हमारा, जन्म जन्म का नाता है ||३||

गौमाता की पीड़ा

कृष्ण दुलारी कितनी खुश थी, नन्दगांव बरसाने में |
कचरा खाती आज घूमती वही गाय वीराने में ||
घर में रखा, देखभाल की, जब तक गाय ने दूध दिया
सड़कों और गलियोँ में छोड़ा, बेरहमी से त्याग दिया
कील, प्लास्टिक, शीशा खाकर, मरने को मजबूर किया
तड़प, तड़प कर प्राण दिये, गाय ने क्या कसूर किया
लाखों गाय कट रहीं निरंतर, हर कत्लखाने में |
कृष्ण दुलारी कितनी खुश थी, नन्दगांव बरसाने में |
कचरा खाती आज घूमती वही गाय वीराने में ||

प्लास्टिक और कचरा मिल कर, जहर बना देते हैं
लाखों कीड़े अन्दर से हर पेट में पीड़ा देते हैं
कष्ट, यातना देदेके, बीमार बना देते हैं
खड़ी नहीं रह सकती, इतना कमज़ोर बना देते हैं
पेट में बच्चा खाए गंदगी, शेष नहीं कुछ खाने में |
कृष्ण दुलारी कितनी खुश थी, नन्दगांव बरसाने में |
कचरा खाती आज घूमती वही गाय वीराने में ||

आखरी सांसे लेती लेती दुर्घटना में मरती है
कभी कभी गाय के ऊपर से पूरी गाड़ी गुज़रती है
लहु लुहान होकर के फिर गौमाता आहें भरती है
रोयें सारे देवी देवता बेबस रोती धरती है
कैसे कैसे जुल्म सहे हैं ऐसे बेदर्द ज़माने में |
कृष्ण दुलारी कितनी खुश थी, नन्दगांव बरसाने में |
कचरा खाती आज घूमती वही गाय वीराने में ||

नन्दबाबा गौभक्त थे, लाखों गाय रखते थे
रघु असंख्य गायों का, पालन पोषण करते थे
सारे हमारे ऋषि मुनि, गौ की सेवा करते थे
दूध की नदियां बहती थीं, सोने के खज़ाने भरते थे
राम, कृषण दोनों जन्मे, गाय के घराने में |
कृष्ण दुलारी कितनी खुश थी, नन्दगांव बरसाने में |
कचरा खाती आज घूमती वही गाय वीराने में ||